धीमी न्यायिक व्यवस्था: जेलों में आबादी से ज्यादा बंद है एससी,एसटी,ओबीसी औऱ मुस्लिम विचाराधीन कैदी

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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ें बताते हैं कि  “देश की जेलों में 4,78,600 कैदी हैं जिनमें 3,15,409 कैदी एससी, एसटी और ओबीसी के हैं.” मामले पर केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया था कि देश में करीब 34 फीसद कैदी ओबीसी वर्ग के हैं जबकि करीब 21 फीसद अनुसूचित जाति से और 11 फीसद अनुसूचित जनजाति से हैं. ये आंकड़े इन वर्गों की जनसंख्या के मुकाबले काफी ज्यादा है.
फरवरी 2021 में सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, एससी और ओबीसी श्रेणियों के कैदियों की अधिकतम संख्या उत्तर प्रदेश की जेलों में है, जबकि मध्य प्रदेश की जेलों में अनुसूचित जनजाति समुदाय के सबसे ज्यादा कैदी हैं.

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एनसीआरबी 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर की जेलों में बंद दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या देश में उनकी आबादी के अनुपात से कहीं ज्यादा है. यही नहीं, एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, देश की जेलों में बंद विचाराधीन मुस्लिम कैदियों की संख्या दोषी ठहराए गए मुस्लिम कैदियों से ज्यादा है.

image: google

 

रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 के आखिर तक देश भर की जेलों में 21.7 फीसद दलित बंद थे जबकि जेलों में अंडरट्रायल कैदियों में 21 फीसदी लोग अनुसूचित जातियों से थे. हालांकि जनगणना में उनकी कुल आबादी 16.6 फीसदी है. आदिवासियों यानी अनुसूचित जनजाति के मामले में भी जनसंख्या और जेल में बंद कैदियों का अंतर ऐसा ही है.

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गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी ने फरवरी 2021 को राज्यसभा को एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी उपलब्ध कराई थी। उन्होंने बताया कि यह आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा, 31 दिसंबर 2019 तक अद्यतन किए गए आंकड़ों के संकलन पर आधारित हैं।

रेड्डी ने बताया कि आंकड़ों के अनुसार, 1,62,800 कैदी (34.01 फीसदी) अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं जबकि 99,273 कैदी (20.74 फीसदी) अनुसूचित जाति से और 53,336 कैदी (11.14 फीसदी) अनुसूचित जनजाति से हैं। उन्होंने बताया कि कुल 4,78,600 कैदियों में से 4,58,687 कैदी (95.83 फीसदी) पुरुष और 19,913 कैदी (4.16 फीसदी) महिलाएं हैं।

एनसीआरबी की इस रिपोर्ट के अलावा एक अन्य रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि भारत की जेलों में बंद 69 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत की जेलों में बंद हर दस में से सात कैदी अंडरट्रायल हैं। यह वे बंदी हैं, जिन्हें अदालत से सजा नहीं मिली है, लेकिन जेल में बंद हैं।

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विचाराधीन कैदियों की सूची में मुस्लिम समुदाय के 18.7 फीसद लोग हैं. आंकड़ों के मुताबिक, विचाराधीन कैदियों के मामले में मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या और अनुपात दलितों और आदिवासियों से भी ज्यादा है. एनसीआरबी के साल 2015 के आंकड़ों से तुलना करने पर पता चलता है कि विचाराधीन मुस्लिम कैदियों का अनुपात साल 2019 तक कम हुआ है लेकिन दोषियों का प्रतिशत बढ़ गया है. साल 2015 में जहां देश भर की जेलों में करीब 21 फीसद मुस्लिम कैदी विचाराधीन थे जबकि करीब 16 फीसद कैदी दोषी पाए गए थे.

जेलों में बड़ रही विचाराधीन कैदियों की संख्या –

2019 में देश में कुल 1350 जेल थी , जिनमे सबसे ज्यादा 144 जेल राजस्थान में है और दिल्ली में सबसे ज्यादा 14 केंद्रीय जेले है।
कम से कम छह राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशो में एक भी केंद्रीय जेल नहीं है।
हाल ही में संविधान दिवस के मौके पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा था कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को देश और देशवासियों के लिए ‘समान सोच’ रखने की आवश्यकता है. उच्चतम न्यायालय द्वारा यहां संविधान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के समापन समारोह को संबोधित करते हुए मुर्मू ने मामूली अपराधों के लिए वर्षों से जेलों में बंद गरीब लोगों की मदद करके वहां कैदियों की संख्या कम करने का सुझाव दिया.

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उन्होंने कहा, ‘‘कहा जाता है कि जेलों में कैदियों की भीड़ बढ़ती जा रही है और जेलों की स्थापना की जरूरत है? क्या हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं? तो फिर और जेल बनाने की क्या जरूरत है? हमें उनकी संख्या कम करने की जरूरत है.’’ मुर्मू ने कहा कि जेलों में बंद इन गरीब लोगों के लिए अब कुछ करने की जरूरत है.उन्होंने कहा, ‘‘आपको इन लोगों के लिए कुछ करने की जरूरत है. जानने की कोशिश कीजिए कि आखिर कौन हैं ये ?

image file photo (dalit times)

 

2020 में इंडियन जस्टिस रिपोर्ट भी सामने आयी थी जो निजी संस्थानों की मदद से तैयार की गयी थी जिसमे देश की जेलों में बंद कैदियों संबंधित आकड़ो का जिक्र है। रिपोर्ट के मुताबिक देश की जेलों में बंद कैदियों का 69 फीसदी हिस्सा उन कैदियों का है जो विचाराधीन है। यानी उनके मुकदमे अभी अदालतों में चल रहे है अगर अदालत उन्हें निर्दोष करार देती है तो वे रिहा हो सकते है।

जेल में बंद कैदियों के सामाजिक आकड़ो के अलावा देश की जेलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है और इन जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी भरे हुए है
दोषी कैदियों से ज्यादा विचाराधीन कैदियों का जेल में होना धीमी न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करता है और हाल ही में महामहिम राष्ट्रपति
द्रोपदी मुर्मू ने भी इस पर चिंता जताई है।

Source – NCRB 2021, Indian Justice Report 2020

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