आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र में दलितों का स्थान

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बीजेपी और उसका पैतृक संघठन RSS अपने बहुप्रतीक्षित हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में काफी समय से प्रयासरत है लेकिन 2014 के बाद जब बीजेपी सत्ता में आई तो RSS के राष्ट्र निर्माण कार्य की गति काफी तेज़ हो गयी।

हमें आए दिन अल्पसंख्यक विरोधी नारे, धर्म द्रोही, देश द्रोही, और प्रचंड हिन्दू राष्ट्रवाद जैसे मुद्दें के गाहे बगाहे सुनाई दे ही जाते है। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है कि अब सभी के लिए धर्म से जुड़ी चीज़ें ज्यादा मायने रखने लगी है।

सरकारें आती जाती रही है लेकिन वर्तमान बीजेपी की सरकार में जिस प्रकार का हिंदुत्व और प्रशासन के अद्भुत गठजोड़ का संयोग देखने को मिला है। हालांकि इसके दूरगामी परिणाम भयावह होंगे इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

हिंदुत्व, बीजेपी और RSS के हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की संकल्पना का प्रयोग है। यह कोई धर्म या विश्वास नहीं है यह ब्राह्मणवाद और सवर्ण मानसिकता से ओत-प्रोत संविधान विरोधी, दलित विरोधी और स्त्री अधिकार के विरोध का उग्र संस्करण है। जिसका उद्देश्य भारत में बाबा साहब के सवधर्म और सामाजिक समरसता को बनाये रखने के विचार के विरुद्ध है। साथ ही भारत की आत्मा यानि संविधान को उखाड़ फेकने और उसके स्थान पर मनु स्मृति को स्थापित करने से है।

rashtriya swayamsevak sangh (image credit google)

यह उन सभी कट्टरवादी लोगो का कवच है जो अपने पाखंड और विभाजनकारी पुस्तकों के निर्माण से अब तक चले आ रहे वर्ण व्यवस्था और छुआ – छूत जैसे कुकृत्य को आधुनिक समय में भी बनाये रखना चाहते है।

हिन्दू राष्ट्र निर्माण की आड़ में RSS अपने सदियों पुराने चले आ रहे दलितों को दोयम दर्ज़े का नागरिक बनाने और उनके अधिकारों का हनन करने की प्रथा को बनाये रखना चाहता है। यह किसी भी प्रकार के परिवर्तन को अस्वीकार करता है।

जब बाबा साहेब अंबेडकर हिन्दू स्त्रियों की मुक्ति के लिए हिन्दू कोड बिल कानून लाना चाहते थे तब यही राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिन्दुत्वादी समूहों ने कानून और बाबा साहेब की आलोचना कर उनकी छवि को धूमिल करने की पुरज़ोर कोशिश की थी। हिंदुत्व उस विषैले वट वृक्ष की तरह फैलता जा रहा है जिसकी जड़े अमानवीय, छुआ छूत, भेदभाव से परिपूर्ण और दलितों के अधिकार के प्रति असहिस्णु एवं क्रूर है। जिसका चरित्र ही मनु स्मृति के अनुसार वर्ण व्यवस्था को बनाये रखना है।

RSS की सवर्ण संघठनात्म व्यवस्था में दलित कभी अपना अधिकार प्राप्त नहीं कर पाएंगे। क्योंकि मुखौटा भले ही हिंदुत्व का है लेकिन पुर्नस्थापना ब्राह्मणवाद की ही होनी है।  दलित, वर्ण व्यवस्था के अनुसार RSS के राष्ट्र निर्माण कार्य में निचले दर्ज़े के काम एवं सेवा तो कर सकते है लेकिन ना तो अपने विचार रख सकते है और ना ही किसी प्रकार के निर्णय में अपना योगदान दे सकते है।

सवर्ण हिन्दू कभी भी अपनी पौराणिक किताबों से खुद को अलग नहीं करेंगे और जब तक उनकी धार्मिक किताबे उनके समाज में यथास्थिति अपने स्थान पर बनी रहती है तब तक दलित को वो कभी अपने बराबर का नहीं समझेंगे। दलितों के साथ ना भोजन कर सकते है, ना ही उनके हाथ का पानी पी सकते है। न ही उनके साथ बैठ सकते है क्युकी उनका धर्म भ्र्ष्ट हो सकता है।

इन समस्याओं का एक ही समाधान है जब हिन्दू अपनी सदियों पुरानी सड़ी-गली संकीर्ण मानसिकताओं के साथ साथ अपने उन धार्मिक पुस्तकों में भी आग लगा दे। जो की वर्तमान में और आने वाले समय में असंभव सा प्रतीत होता है।  इसलिए दलितों को अपने उत्थान के लिए RSS के राम राज्य की नहीं, बल्कि अंबेडकर युग की आवश्यकता है।

(लेखक: नवीन गुप्ता)  
 

 

 

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