नीति बनाम राजनीति कैसे बना 2024 का चुनाव

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लोकसभा चुनावों की सभी चरण पूरे हो चुकें हैं और अब बस 4 जून को नतीजे आना बाकी है। हालांकि इस बीच सभी मीडिया चैनलों पर एक्जिट पोल दिखाए जाने लगे। किसी चैनल पर कोई जीतता हुआ दिख रहा है तो किसी चैनल पर कोई बुरी तरह हारता हुआ । ऐसे में नीति बनाम राजनीति कैसे बना 2024 का चुनाव बता रहें हैं मीडिया कंसल्टेंट -सिद्धार्थ शर्मा

पार्टियों के लिए राजनीति महत्वपूर्ण होती है क्योंकि राजनीति से सत्ता मिलती है। दूसरी तरफ लोक के लिए सत्ता द्वारा बनाई गई नीतियां ज्यादा मायने रखती हैं। पिछले दस वर्ष में भारत में नीतियों पर राजनीति हावी रही। सत्ताधारी भाजपा ने भी अपनी शक्तिशाली प्रचारतंत्र से मीडिया तक में नीतियों के स्थान पर राजनीति को ही परोसा। दस सालों के इस सैचुरेशन कवरेज के चलते लोक को नीतियों के बदले राजनीति में उलझाए रखने में भाजपा बड़े हद तक सफल भी रही।

इसी दस साल के कालखंड में दूसरी तरफ कई राज्यों की जनता पर सत्ता की नीतियों का प्रत्यक्ष असर भी हुआ। तमिलनाडु की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय 2012 के डेढ़ लाख रूपये से बढ़ कर 2023 में साढ़े तीन लाख रुए हो गई। उत्तर प्रदेश में जब बुलडोजर चल रहे थे तब कर्नाटक की सवा तीन करोड़ महिलाओँ की बस यात्रा मुफ्त हो गई। 2023 में सबसे अधिक अपराधों की रिपोर्ट के साथ उत्तर प्रदेश जब सूची में शीर्ष पर था, तभी सीमांत एवं तथाकथित अशांत पंजाब का अपराध दर भारत के अपराध दर से कम हो गया था। जब भारत सरकार 11 लाख करोड़ रूपये की घाटे में चल रही थी तभी दिल्ली राज्य की सरकार लोगों को सार्वत्रिक स्वास्थ्य शिक्षा बिजली पानी मुफ्त देकर भी मुनाफे में चल रही थी।

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तो हुआ ये की 2014 की सैचुरेशन राजनीति का पाला 2024 में नीतियों से पड़ गया है। भूखे भजन न होहिं गोपाला, ये लो कंठी ये लो माला की कहावत चरितार्थ होने लग गई। 2014 से सत्ता में बैठी भाजपा सरकार ने राजनीति में जो धुरन्धरता दिखाई, वो नीतियों में सिफर रही। चाहे नोटबंदी हो या कोरोना काल, चाहे महंगाई हो या बेरोजगारी, चाहे लद्दाख में चीन का अंदर आना हो या मालदीव से भारत का बाहर जाना, सभी विषयों में स्पष्ट नीतियों की कमी की भरपाई G 20, नया संसद भवन, रामलला आदि इवेंट से करने की कोशिश दिखी। दंतकथा है की रावण ने भी अपनी समूची प्रजा को स्वर्ग तक की सीढ़ी बनाने और समुद्र के पानी को मीठा बनाने का असंभव रोजगार देकर बरगला रखा था।

ऊपर से अपनी नीतियों की अकर्मण्यता को छुपाने के लिए भाजपा ने अपनी कर्मण्यता विरोधियों को सजा देने में लगाना प्रारम्भ किया। भारत की औसत जनता शांतिप्रिय होती है। क्रूरता भारत की मानसिकता को नहीं भाती। महाभारत का युद्ध हो या रावण वध, दोनों में अर्जुन और राम ने अपने प्रतिद्वंद्वी भीष्म और रावण का वध भी किया तो पूरे आदर के साथ, बिना क्रूरता दिखाए। दूसरी तरफ महुआ मोइत्रा हो, या कांग्रेस का खाता बंद करवाना हो या केजरीवाल को जेल हो, भाजपा ने क्रूरता दिखाई। जनता सत्ता को सेवा करने का मौक़ा मानती है जबकि भाजपा ने सत्ता को सजा देने का हक़ मान लिया।

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राजनैतिक रूप से भी देखा जाय तो भारत की जिन जिन राज्यों की अपनी लिपि हैं वहां वहां भाजपा कमजोर है, चाहे पंजाब हो या बंगाल हो या केरल। तो स्थानीय लिपि वाले 10 राज्यों में 2019 में भाजपा को 76 / 238 सीटें ही आयी थी -गुजरात, कश्मीर, पंजाब, बंगाल, ओडीशा, तेलंगाना, आंध्र, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक। बाक़ी उन राज्यों में जहां की लिपि देवनागरी है, वहां से भाजपा को 227 / 305 सीट आयी थी।

प्रकृति के नियम में एक ध्रुव नहीं होता। दिन के साथ रात और लोहे के टुकड़े तक में दो ध्रुव होते ही हैं। भारत के संविधान तक में विधायिका और कार्यपालिका को स्वतन्त्र और एक दूसरे का अधिक्रमण करने के अधिकार प्राप्त हैं। भाजपा की एक ध्रुवीय राजनीति को कई क्षेत्रीय छत्रपों से दो दो हाथ करना होता है। मधुमक्खियों का झुण्ड बड़े से बड़े हाथी तक को नाप लेता है। 2019 में जो क्षेत्रीय दल भाजपा से अकेले अकेले लड़ रहे थे, 2024 में वो टिड्डी दल मिलजुलकर रणनीति के तहत लड़ रहा है। बंगाल में ममता वो प्रतीक है तो पंजाब में भगवंत मान। बिहार में तेजस्वी का रूप है तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश। महाराष्ट्र में उद्धव है तो कर्नाटक में सिध्दरामैया। तो उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली, बंगाल में भी भाजपा को सशक्त क्षत्रपों के चलते 2019 की तुलना में सीटों की कमी झेलनी होगी।

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हालिया सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से भी साफ़ होता है की न्यायपालिका तक ने ऐन मौके पर भाजपा की बची खुची नीतियों को निरस्त करने की ठान ली है। वरना चुनावी बॉन्ड हो या केजरीवाल की जमानत, चंडीगढ़ निगम चुनाव की चोरी हो या EVM पर्चियों की गिनती, इन सभी मामलों में न्यायपालिका का ऐन चुनाव घोषणा के बाद सक्रीय होना ही बताता है की राजनितिक नियुक्ति प्राप्त मिलॉर्ड्स ने भी कदाचित हवा का रुख भांप लिया है।

ऐसे में 2024 के चुनाव में भाजपा को भारत के 30 राज्यों में 2019 की तुलना में हर राज्य में औसत एक सीट का भी नुकसान 272 से नीचे ला देगा क्योंकि दस साल से भाजपा की सिफर नीतियों की भुक्तभोगी जनता खुद ये चुनाव लड़ रही है। वर्तमान भारतीय राजनीति का एक ध्रुव यदि निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी है तो दूसरे ध्रुव के रूप में भारत की जनता स्वयं है। और पिछले दस साल में भाजपा ने जो सबसे बड़ी गलती की, वो था भारत के नागरिकों को प्रजा मानना।

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