स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी शिक्षा व्यवस्था को समानता और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से नया रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया। लेकिन, गहराई से निहित सामाजिक पूर्वाग्रहों ने SCs, STs और OBCs के लिए शैक्षिक पहुंच को प्राप्त करने में एक बड़ी रुकावट उत्पन्न की…
भारत की शिक्षा व्यवस्था का इतिहास इसकी सामाजिक संरचनाओं से गहरे तौर पर जुड़ा हुआ है। जाति आधारित भेदभाव का प्रभाव अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs), और अन्य पिछड़ी जातियों (OBCs) की शिक्षा पर गहरा प्रभाव डालता है। जबकि भारत की स्वतंत्रता के बाद की शिक्षा नीतियों ने समावेशन की दिशा में प्रयास किया है। लेकिन सदियों पुरानी भेदभाव की विरासत आज भी सामाजिक न्याय की राह में एक बड़ा अवरोध बनी हुई है। यह लेख भारत की स्वतंत्रता के बाद इन हाशिए पर जीवन यापन करने वाली जातियों की शिक्षा यात्रा, उनके द्वारा सामना की गई चुनौतियों और समानता की दिशा में किए गए महत्वपूर्ण प्रयासों पर प्रकाश डालता है।
जाति आधारित भेदभाव की विरासत
1947 से पहले भारत में शिक्षा अधिकांशतः उच्च जाति के अभिजात वर्ग के हाथों में थी। निचली जातियों, विशेष रूप से SCs, STs और OBCs को शिक्षा तक पहुंच से षड्यंत्र के तहत वंचित रखा गया। आज भी भारत के कई हिस्सों में, छुआछूत एक कठोर सामाजिक प्रथा चल रही है। जिसने SCs और STs को केवल शैक्षिक अवसरों से नहीं बल्कि बुनियादी मानव गरिमा से भी वंचित किया गया है। यह प्रणाली एक कठोर जाति व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई थी। जो लोगों को निम्न श्रेणी के कार्यों में सीमित रखती थी और उन्हें उन पेशों में प्रवेश से रोकती थी जिनके लिए औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता थी।
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स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी शिक्षा व्यवस्था को समानता और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से नया रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया। लेकिन, गहराई से निहित सामाजिक पूर्वाग्रहों ने SCs, STs और OBCs के लिए शैक्षिक पहुंच को प्राप्त करने में एक बड़ी रुकावट उत्पन्न की।
संविधानिक प्रावधान और शिक्षा
इन हाशिए पर जीवन यापन करने वाले समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भारतीय संविधान के 1950 में अंगीकरण के साथ आया। संविधान के निर्माणकर्ताओं ने SCs, STs और OBCs द्वारा झेली गई ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करने के लिए सकारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता को समझा गया। संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को निषेध करता है। जबकि अनुच्छेद 46 राज्य को इन समुदायों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने की दिशा में मार्गदर्शन करता है।
इन संविधानिक गारंटी के बावजूद, जाति आधारित भेदभाव की सामाजिक वास्तविकता देश के कई हिस्सों में अभी भी मौजूद है। उदाहरण स्वरूप, ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों को जाति के आधार पर अलग थलग रखा गया है। तथाकथित निम्न जाति के बच्चों को अक्सर प्रवेश से वंचित किया जाता है या उन्हें अलग बैठने के लिए मजबूर किया जाता था। यह सामाजिक बहिष्कार STs, OBCs विशेषकर SCs के लिए शिक्षा तक पहुंच प्राप्त करने में कठिनाई पैदा करता था।
आरक्षण नीति का परिचय
1950 में, भारत सरकार ने सकारात्मक कार्रवाई के तहत आरक्षण प्रणाली की शुरुआत की, जिसके तहत SCs, STs और OBCs के लिए शैक्षिक संस्थाओं में निश्चित प्रतिशत सीटें आरक्षित की गईं। इसका उद्देश्य इन समुदायों को उन अवसरों तक पहुंच प्रदान करना था जो ऐतिहासिक रूप से उनसे वंचित रखी गई थीं।
प्रारंभ में आरक्षण मुख्य रूप से सरकारी नौकरियों पर केंद्रित था। लेकिन इसे बाद में शैक्षिक संस्थानों, जैसे कि चिकित्सा कॉलेजों, इंजीनियरिंग संस्थानों और विश्वविद्यालयों तक बढ़ा दिया गया। लंबे संघर्ष बाद 1990 में, सरकार ने मंडल आयोग रिपोर्ट के बाद OBCs के लिए केंद्रीय सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में 27% आरक्षण की घोषणा की।
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जहां एक तरफ आरक्षण प्रणाली ने SCs, STs और OBCs के लिए शिक्षा में पहुंच बढ़ाने का एक प्रमुख उपकरण का कार्य किया है। वहीं दूसरी तरफ यह उच्च जाति कहे जाने वाले समुदायों के बीच नफरत का विषय भी बना हुआ है। समर्थक इसे उच्च शिक्षा के दरवाजे खोलने और हाशिए पर जीवन यापन करने वाले समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के रूप में देखते हैं। जबकि आलोचक इसे उल्टा भेदभाव मानते हैं और इसके सुधार या उन्मूलन की मांग करते हैं।
शिक्षा में प्रगति
चुनौतियों के बावजूद, स्वतंत्रता के बाद SCs, STs और OBCs के लिए शैक्षिक परिणामों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। आरक्षण प्रणाली, छात्रवृत्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सरकारी योजनाओं के कारण SC, ST और OBC छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
उदाहरण स्वरूप, 1995 में शुरू की गई मध्याह्न भोजन योजना ने SC, ST और OBC बच्चों की शिक्षा पर सकारात्मक प्रभाव डाला है, जिससे स्कूल उपस्थिति में वृद्धि और ड्रॉप-आउट दरों में कमी आई है। यह योजना, जो विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में छात्रों को मुफ्त भोजन प्रदान करती है, को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि इसने हाशिए पर जीवन यापन करने वाले समुदायों के बच्चों को स्कूल में बनाए रखा और उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में मदद की।
इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना जैसी विभिन्न सरकारी छात्रवृत्तियां, SCs के लिए राष्ट्रीय फैलोशिप योजना और OBCs के लिए प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाएं, उच्च शिक्षा में इन समुदायों के छात्रों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। शैक्षिक संस्थानों, विशेष रूप से केंद्रीय और राज्य सरकार के क्षेत्रों में, अब SC, ST और OBC छात्रों का महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व है, जिसने एक अधिक समावेशी शैक्षिक वातावरण को बढ़ावा दिया है।
चुनौतियां और बाधाएं
इन उपलब्धियों के बावजूद, SCs, STs और OBCs के शैक्षिक प्रगति में अब भी कई चुनौतियां हैं। एक प्रमुख समस्या है इन समुदायों के लिए उपलब्ध शिक्षा की गुणवत्ता। कई ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों में धन की कमी, शिक्षकों की कमी और बुनियादी ढांचे की कमी है। इन क्षेत्रों में शिक्षक ठीक से प्रशिक्षित नहीं होते, और अक्सर अध्ययन सामग्री की कमी होती है। जिससे छात्रों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
इसके साथ साथ, शैक्षिक संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक पूर्वाग्रह आज भी व्यापक रूप से मौजूद हैं। SC, ST और OBC छात्रों को अक्सर अपमान और बहिष्कार का सामना करना पड़ता है, खासकर प्रतिष्ठित स्कूलों और कॉलेजों में। इस प्रकार के भेदभाव से उनके आत्म-सम्मान और शैक्षिक प्रदर्शन पर गहरा असर पड़ता है। जिसके कारण इन छात्रों की ड्रॉप-आउट दरें बढ़ गयी हैं।
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एक और प्रमुख समस्या उच्च शिक्षा और पेशेवर क्षेत्रों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व की कमी है। जबकि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इन समुदायों के छात्रों की संख्या बढ़ी है, कानून, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और व्यवसाय जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी कम है। उचित मार्गदर्शन, संसाधनों और मेंटरशिप की कमी के कारण SC, ST और OBC छात्रों के लिए इन अनुशासन में सफलता प्राप्त करना और उन्हें आगे बढ़ाना कठिन होता है।
भविष्य की ओर: जाति रहित समग्र सुधार की आवश्यकता
यह माना जाता रहा है कि शिक्षा जाति आधारित असमानता को कम करने में एक महत्वपूर्ण कारक रही है। परन्तु भारत में SCs, STs और OBCs के लिए सच्चे सामाजिक न्याय और परिवर्तन की प्राप्ति के लिए और भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो जाति घृणा से ऊपर उठकर न केवल पहुंच बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करें, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार भी करें। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों, बेहतर बुनियादी ढांचे और ग्रामीण और हाशिए पर स्थित क्षेत्रों में स्कूलों के लिए उचित वित्तपोषण, शैक्षिक अंतर को पाटने के लिए आवश्यक हैं।
इसके अलावा, शैक्षिक संस्थानों में जो सामाजिक पूर्वाग्रह मौजूद हैं, उन्हें संबोधित करना भी जरूरी है। जातियों और समुदायों के प्रति विविधता, समावेशन और सम्मान को बढ़ावा देने वाली जागरूकता कार्यक्रमों की शुरुआत की जानी चाहिए, ताकि SCs, STs और OBCs ऐसे माहौल में शैक्षिक सफलता प्राप्त कर सकें, जहां उन्हें भेदभाव का डर न हो।
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अंत में, आरक्षण प्रणाली को निरंतर समीक्षा और अद्यतन किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह इन समुदायों के सबसे वंचित वर्गों को लाभ पहुंचाती रहे। एक गतिशील, merit आधारित दृष्टिकोण, जो केवल जाति पर नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर केंद्रित हो, आज के तेजी से बदलते विश्व में इन समुदायों की बदलती जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है।
निष्कर्ष
इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का एक शक्तिशाली उपकरण है। भारत में इसने गहरे जड़ें जमाए जाति व्यवस्था को चुनौती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जबकि स्वतंत्रता के बाद SCs, STs और OBCs के लिए शैक्षिक पहुंच में प्रगति हुई है, जबकि समानता की लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है। यह महत्वपूर्ण है कि भारत इन समुदायों के सामने आने वाली शैक्षिक बाधाओं को जातीय घृणा से ऊपर उठकर समाप्त करने का प्रण ले। एक समावेशी और समान प्रणाली की दिशा में काम करे। जो प्रत्येक नागरिक को सफल होने का समान अवसर प्रदान करती हो। तभी भारत अपने संविधान में निहित न्याय और समानता के वादों को पूरा कर सकेगा।
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