कांकेर में 11 आदिवासी गांवों में शराबबंदी के खिलाफ अनोखी पहल, स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों ने खुद बनाये कड़े कानून

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छत्तीसगढ़ के कांकेर जनपद स्थित चारामा विकासखंड के 11 गांव के आदिवासी ग्रामीणों ने आपसी सहमति से बैठक की और गांव में शराब पीने और महुआ की शराब बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इतना ही नहीं शराब पीने और बनाने वालों पर जुर्माना लगाने की भी पहलकदमी ली है….

Kanker Tribal news : आदिवासियों के बारे में माना जाता है कि वह शराब खासकर कच्ची शराब पीने के आदी होते हैं और यह आदत उनमें बचपन से ही लग जाती है। कुछ हद तक यह बात सही भी है, क्योंकि शिक्षा के अभाव में बचपन से ही पेट भरने के लिए किशोरों को काम करना पड़ता है और उसी के साथ यह जानलेवा लत भी स्थानीय स्तर पर ही शराब बनाने के कारण लग जानी बहुत आम है। ग्रामीण स्तर पर बहुत कम युवा ऐसे होते हैं जो शराब न पीते हों, मगर अब छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने शराब के खिलाफ जंग छेड़ दी है, और इसके लिए उन्होंने सरकार के सहयोग के बिना खुद के स्तर पर पहलकदमी ली है।

छत्तीसगढ़ में हमेशा से शराबबंदी एक बड़ा मुद्दा रहा है। कुछ दिन पहले सत्तासीन भाजपा सरकार ने हालांकि प्रदेश में नई शराब की दुकानें न खोलने का फैसला किया है, मगर शराबबंदी को लेकर कोई कड़ा कदम उठाया जायेगा ऐसा फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। सरकार द्वारा शराबबंदी के लिए कोई सख्ती न दिखाये जाने पर अब आदिवासियों ने खुद कमान संभाल ली है। ईटीवी भारत में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक छत्तीसगढ़ के कांकेर जनपद स्थित चारामा विकासखंड के 11 गांव के आदिवासी ग्रामीणों ने आपसी सहमति से बैठक की और गांव में शराब पीने और महुआ की शराब बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इतना ही नहीं शराब पीने और बनाने वालों पर जुर्माना लगाने की भी पहलकदमी ली है। कहा है कि किसी को ऐसा करते हुए रंगे हाथों पकड़ने वाले को इनाम भी दिया जायेगा।

जिन आदिवासी गांवों के ग्रामीण शराबबंदी के लिए सक्रिय हुए हैं उनमें चारामा विकासखण्ड अंतर्गत आदिवासी समाज के आरौद सर्कल अंतर्गत डोडकावाही, शाहवाड़ा, पलेवा, रानी डोंगरी, कोटेला, कुर्रूभाठ, टहंकापार, नवीन आरौद, आरौद, भैसाकट्टा, बंडाटोला गांव आते हैं।

मीडिया से बात करते हुए एक ग्रामीण महिला कहती है, सरकार शराब बंद नहीं करा पाई, जिस कारण हमने शराबबंदी का फैसला किया है। हम चाहते हैं कि हमारा आदिवासी समाज सुधरे इसलिए हमने ये फैसला लिया है.।आदिवासी समाज में सबसे ज्यादा शराब बनाया जाती है। जब हम शराबबंदी के खिलाफ एक्शन लेंगे तो हमारे साथ छत्तीसगढ़ के अन्य समाजों के लोग भी सुधरेंगे।

गौरतलब है कि आदिवासियों में शिक्षा के अभाव के कारण छोटी उम्र में बच्चों को शराब की लत लग जाती है। शराब के लती आदिवासी बच्चों की पढ़ाई पीछे हो जाती है, जिस कारण अच्छे रोजगार का भी संकट बना रहता है।

मीडिया से हुई बातचीत में परगना मांझी श्रवण दर्रो क​हते हैं, शराब बनाने, पीने औए बेचने वालों के ऊपर जुर्माना तय किया गया है। शराब पीकर हुल्लड़बाजी करने वालों पर भी जुर्माना लगाया जाएगा। यह जुर्माना 11 गांव के बैठक में सबके सामने परिवारवालों के सामने भरना होगा। शराब बनाने और बेचने वाले पर 10 हजार रुपए जुर्माना, पीने वाले पर 5 हजार रुपए जुर्माना और शराब पीने के बाद हल्ला करने वालों पर 20 हजार जुर्माना लगाने की बात ग्रामीण कर रहे हैं। इतना ही नहीं अगर कोई अगर शराब बनाते, बेचते, पीते हुए का कोई फोटो या वीडियो प्रमाण के तौर पर देता है तो उस व्यक्ति को 2 हजार रुपए पुरस्कार दिया जायेगा और उसका नाम भी एक्सपोज नहीं किया जायेगा।

रिपोर्ट के मुताबिक जब से कांकेर के इन 11 आदिवासी गांवों में शराबबंदी हुई है तब से नौजवान चौक-चौराहों पर जहां-तहां नजर नहीं आते। शराब पीने के बाद किसी प्रकार की हुल्लड़बाजी की घटनायें भी सामने नहीं आ रही हैं। गांवों में शराब बनाकर बेचने-पीने और हुल्लड़बाजी रोकने के लिए 11 गांव के लोगों ने एक उड़न दस्ता टीम भी गठित की है। इस टीम की सदस्य महिलायें शाम को गांव में हाथ में डंडा पकड़कर गलियों में घूमती हैं।

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