छुआछूत एक मानिसक बिमारी है ?

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आज समाज के अनेक लोगो ने समय के साथ अपने मन मस्तिष्क मेसे जातिगत भेदभाव का शथिलिकरण किया है परंतु अधिकांश लोगो ने सुविधा व समय की माँग को  देखते हुए दोहरा चरित्र अपना लिया है।

 

भारतीय समाज मे व्याप्त जातिवाद आर्य संस्कृति की अभिशप्त खोज है। जातिवाद का आधार चतुरवर्णीय सामाजिक व्यवस्था पर आधारित है, जिसमे ब्राहमण क्षत्रिय वैश्य एवं शुद्र का ऊपर से नीचे तक क्रमिक सौपान है। इसी वर्ण व्यवस्था ने आगे चलकर कार्य के बटवारे  के आधार पर जातिय रचना करके समाज को विखंडित करने का कार्य किया है। इसी जातिगत व्यवस्था के कारण जहाँ कथित उच्च जातियों के लिए तमाम सुख सुविधा, स्वतंत्रता व अवसरों की सुलभता है वही दूसरी तरफ  कथित निम्न जातियों मे शुमार  तबके के  जीवन को अनेक वर्जनाओ के साथ शोषण व हिकारत से पल पल रूबरू होकर दोयम दर्जे के इंसान के रूप मे त्रासदी झेलनी पड़ती थी।

इस जातिवाद की जड़े इतनी गहरी है कि आजादी के करीब आठ दशक  बाद भी समाज के  पिछड़े कहे जाने वाले  बड़े तबके को संवैधानिक  रूप से मिले  मूल भूत अधिकारों के लिए भी  तरसना पड़ता है। आये दिन हमे देखने सुनने व पढ़ने को मिलता है कि भारत के गाँवो मे पानी पीने, अच्छे कपड़े पहनने, मुंछे रखने, कुर्सी या खाट पर बैठने, धार्मिक स्थलों पर प्रवेश करने,  शमसान मे जलाने, घोड़ी पर बैठने , बाल काटने व प्रभावशाली लोगो के सामने नंगे सर अथवा वाहन पर बैठकर निकलने आदि आदि मामलों मे कथित उच्च जातियों के स्वयंभू जन्मजात ठेकेदार असहज हो जाते है।

आज के सभ्य समाज में ऐसे लोगो को मनोविकारी लोग ही कह सकते है। ये कूपमंडुक नुमा संकुचित व घटिया सोच के लोग  मिथ्या जातिय  उन्माद मे इतने उद्वेलित हो जाते है कि समाज के कमजोर व निरपराध लोगो के प्रति असहिष्णु ही नही बल्कि हिंसक पशु की तरह बर्ताव करने से गुरेज नही करते हैं। ऐसे लोगो का शासन प्रशासन व राजनीति मे  खासा दखल  होने के कारण कानूनी खामियों का फायदा उठा कर  अधिकतर अपराधी लोग बच भी जाते है। दूसरी तरफ अशिक्षा, गरीबी, कानूनी अधिकारों की जानकारी के अभाव, राजनितिक असहयोग एवं जातियों मे खंडित सामाजिक रूप से असंगठित  होने के कारण  भुजबल धनबल व सत्ताबल से सक्षम समाज कंटको से लड़कर कमजोर व्यक्ति पार नही पा सकता है।

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यदि वंचित शोषित समाज के सर्वकालिक व सार्वभौमिक आर्थिक, मानसिक व शारीरिक शोषण का ईमानदारी से आंकलन व शौध किया जाय तो दिल दहल जायेगा। संविधानिक प्रावधानों की बाध्यता के फलस्वरूप  जातिय  भेदभाव  भले जाहिर तौर पर कम दिखाई देता है परंतु गहराई से समाज की वास्तविकता को देखा, समझा व परखा जाये तो तस्वीर अत्यंत भयावह है। किस तरह गाँवो मे वंचित समाज के लोग पल प्रतिपल समझोता  करके जीवन जीते है, यह सहज देखा जा सकता हैं।

जातिय दंभ का निर्दयी व्यवहार अतीत में हुआ इसके लिए तो अशिक्षा, अज्ञानता, धार्मिक असहिष्णुता व लोगो का रहन सहन जिम्मेदार रहा होगा परंतु आज का अधिकांश सुशिक्षित वर्ग भी अपनी जातीय कुंठा के वशीभूत अनुचित व्यवहार करता है यह निराशाजनक है। कमजोर जातियों के काबिल व्यक्ति को भी कमतर आँकना एक शगल बन गया है। नित नये बन रहे जातिगत संगठन भी जातीय दंभ को बढ़ाने में भूमिका निभा रहे हैं। अफसोस तो तब होता है जब कुछ साधु संत भी  अपनी जातिगत पहचान पर सार्वजनिक रूप से गर्वित होकर निर्लज्जता दिखाते है। ये लोग भूल जाते है कि साधु के लिए कहा गया है कि जाति न पूंछो साधु की, पुंछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान।

आज समाज के अनेक लोगो ने समय के साथ अपने मन मस्तिष्क मेसे जातिगत भेदभाव का शथिलिकरण किया है परंतु अधिकांश लोगो ने सुविधा व समय की माँग को  देखते हुए दोहरा चरित्र अपना लिया है। ऐसे लोग राजनीतिक, शासनिक, व्यवसायिक मजबूरियो के कारण सार्वजनिक स्थानो पर छुआछूत व भेदभाव खुले रूप  मे नहीं करते है परंतु अपने घर परिवार व जाति समाज मे आते ही भेदपरक आचरण करते है।

हमारे देश की उन्नति मे जातिवाद बड़ी बाधा है क्योकि दकियानुसी जातीय सोच के कारण समाज में परस्पर वैमनस्य बढ़ता है जिसकी परिणीति सामाजिक बटवारे के रूप में प्रकट होती है। यह विडम्बना है कि जातिगत वर्जनाओ के कारण समाज  बहुत से योग्य व क्षमतावान लोगो की प्रतिभा का सदुपयोग राष्ट्र व समाज हित में नही होने से देश का अहित ही होता है।

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यह प्रमाणित सत्य है कि जातिगत  ऊंच नीच व सोच पूरी तरह से अव्यवहारिक , अवैज्ञानिक , अमानवीय व अतार्किक है जिसका कोई औचित्य ही नही है। यह भी सत्य है कि जातीय भेदभाव  अधिकांशतः अपने ही परिचित व कमजोर लोगो के प्रति किया जाता है एवं यह अपनी सुविधा व जरूरत के अनुसार किया जाता है। अनेक लोग अछूत के हाथ का पानी पीने से गुरेज करते हैं परंतु उसके हाथ का माँस  मदिरा सेवन करने से परहेज नहीं करते हैं। जरूरत पड़ने पर किसी का भी रक्तदान लेने मे  एतराज नहीं करते , यही जातिवाद का खोखलापन है।

यह भी एक विचारणीय बात है कि वैज्ञानिको ने हर चीज की शुद्धता परखने के यंत्र व पैमाने बनाये है पर जाति की ऊंच नीच नापने की आजतक कोई तकनिक नही निकाल पाये है। जातिवाद ने समाज व राष्ट्र का इतना अनिष्ट किया है फिर भी देश, धर्म व समाज के रहनुमा उदासीन बने हुए हैं जिसका दुरगामी परिणाम कितना घातक होगा वह अकल्पनीय है।

 भारत देश के उन सभी राजनेताओ, समाज वेत्ताओ, धार्मिक संत महंतो व राजवंशों को जातीय अस्पृश्यता के मनोविकार से बाहर निकलकर अतीत के जातीय दुर्व्यवहार के लिए ईमानदारी पूर्वक शोषित वर्ग के प्रति प्रायश्चित करना चाहिए एवं धार्मिक पुस्तको व सामाजिक परम्पराओ से जातीय हिकारत के प्रसंगो को बाहर करना पड़ेगा। आज के समय की जरूरत है कि देश हित में जातिवादी अस्पृश्यता के मनोविकार से बाहर निकल कर संविधान सम्मत सोच को विकसित करके देश की एकता अखंडता को मजबूती प्रदान करे।

 

लेखक : एम एल डांगी (मोहनलाल डांगी) 

(अपना पूरा करियर दलित जागरूकता और उनके मुद्दों को उठाने में बिताया। उन्होंने कई सीविल सोसाइटी चलाई और विभिन्न एससी/एसटी सरकारी कर्मचारी संघों का नेतृत्व भी किया।) 

 

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