वायु प्रदूषण कर रहा बच्चियों में पहली माहवारी की उम्र को प्रभावित, बना रहता है हृदय रोग-शुगर और कैंसर का खतरा

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माहवारी से जुड़ी इन जटिलताओं के चलते कई बार हमारी बेटियां स्कूल जाना तक बंद कर देती हैं। कारण है शर्म, नैपकिन चेंज करने के लिए सही और साफ जगह के न होने की समस्या, दर्द, दाग लगने का डर, पैड का निस्तारण….

राखी गंगवार की टिप्पणी

Women’s health and Air pollution : सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन अमेरिका में एमोरी यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने बचपन में वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने और लड़कियों को पहली बार मासिक धर्म होने की उम्र के बीच एक संबंध पाया है।

यह शोध एनवायर्नमेंटल हेल्थ पर्सपेक्टिव्स नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ है और इसके अंतर्गत पूरे अमेरिका में 5,200 से अधिक लड़कियों का डेटा एकत्र किया गया। इस डेटा की एनालिसिस में पाया गया कि जिन लड़कियों का बचपन सूक्ष्म कणों वाली प्रदूषित हवा में बीता, उनकी पहली माहवारी जल्दी हुई।

विज्ञान की नज़र से बात करें तो जिन लड़कियों में मासिक धर्म कम उम्र में शुरू होता है, उनमें आगे चल के अपने जीवनकाल में कई बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। इन बीमारियों में हृदय रोग, टाइप 2 मधुमेह और कुछ प्रकार के कैंसर शामिल हैं।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए एमोरी विश्वविद्यालय में एपीडेमिओलोजी या महामारी विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और इस शोध की वरिष्ठ लेखक, ऑड्रे गास्किन कहती हैं, “इस विषय पर और शोध की ज़रूरत है लेकिन फिलहाल ऐसा लगता है कि वायु प्रदूषण प्रजनन विकास की दशा और दिशा निर्धारित कर रहा है।” आगे इस विषय पर चिंतन करें तो समझ आता है कि क्योंकि वायु प्रदूषण का सीधा रिश्ता जलवायु प्रदूषण से है, इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि बदलती जलवायु की भेंट बच्चियों का बचपन और स्वास्थ्य भी चढ़ रहा है।

दरअसल वायु प्रदूषण के कारण वातावरण का तापमान बढ़ता है और ग्लोबल वार्मिंग होती है, जिसके चलते जलवायु में परिवर्तन होता है। वैसे कहने को तो जलवायु परिवर्तन एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन इसकी आग को धधका मनुष्य ही रहा है। सामान्यतः जलवायु में परिवर्तन कई वर्षों में धीरे धीरे होता है। लेकिन इंसानी गतिविधियों, जैसे पेड़ पौधों की लगातार कटाई, गाड़ियों का धुआँ वगैरह, के चलते इसकी गति बढ्ने लगी है। वायु प्रदूषण पर लगाम लगाना मुश्किल हो रहा है और इसके हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव साफ दिख रहे हैं।

बात अगर महिलाओं के स्वास्थ्य की करें, खासकर माहवारी के उन कठिन दिनों की करें, तो पता चलता है कि एक तो न सिर्फ माहवारी कम उम्र में शुरू हो रही है, बल्कि उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ भी महिलाओं को उसी अनुपात में परेशान कर रही हैं। शरीर की साधारण बीमारियाँ या कष्टों की चर्चा तो हम सार्वजनिक रूप में कर लेते हैं, लेकिन माहवारी के दर्द, अनियमितता, घबराहट, संकुचन आदि किसी को बता नहीं पाते।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए और एक महिला के नज़रिये से दीपशिखा, जो कि एक अध्यापिका हैं, बताती हैं, “सर्दियों के कठिन दिनों में दर्द अधिक होता है क्योंकि इस मौसम में शारीरिक गतिविधियां थोड़ी कम होती हैं जिससे ब्लड सर्कुलेशन की स्पीड कुछ कम हो जाती है। इसी वजह से सर्दियों में गर्म चीज़े खाने पीने को कहा जाता है। सर्दियों में प्यास भी कम लगती है और पानी कम पीने से मासिक धर्म के दौरान कई तरह की परेशानी होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब सर्दियाँ भी असमय हो रही हैं और तीव्र भी हो रही हैं। उसी हिसाब से माहवारी की परेशानियाँ भी बढ़ती हैं। इसीलिए जलवायु परिवर्तन की गति को कम करना एक चाहत नहीं, ज़रूरत है।”

एक सर्वे से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती हुई गर्मी में भी अगर मासिक धर्म के दौरान शरीर को हाइड्रेट न रखने से अन्य कई तरह की बीमारी होने का डर रहता है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों की किशोरियों और महिलाओं को जागरूक करना बहुत जरूरी हो जाता है जिससे कि वह शर्म और झिझक की वजह से जाने अनजाने कोई गंभीर बीमारी को जन्म ना दें, क्योंकि कुछ गांव में किए गए सर्वे से पता चला कि सिर्फ 10% ग्रामीण महिलाएं ही सैनिटरी नैपकिन का प्रयोग करती हैं। ध्यान रहे, महावरी में गंदे कपड़े के प्रयोग से संक्रमण होने का डर बना रहता है।

माहवारी से जुड़ी इन जटिलताओं के चलते कई बार हमारी बेटियां स्कूल जाना तक बंद कर देती हैं। कारण है शर्म, नैपकिन चेंज करने के लिए सही और साफ जगह के न होने की समस्या, दर्द, दाग लगने का डर, पैड का निस्तारण आदि। महिलाओं को इन दिनों बेहद साफ सफाई रखनी चाहिए साथ ही बेटियों को जागरूक करना चाहिए उनके खान पान का ध्यान रखते हुए संतुलित आहार जरूरी है।

वैसे तो स्वच्छता को लेकर अब स्कूलों में और ग्रामीण क्षेत्रों में भी सरकार के द्वारा कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, लेकिन फिर भी अभी जागरूकता की कमी ग्रामीण इलाकों में देखने को मिलती है। अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि अब, जब जलवायु परिवर्तन बच्चियों के मासिक चक्र तक पर असर डाल रहा है और उनके स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक परिणाम डाल रहा है, तब यह बेहद ज़रूरी है कि माहवारी से जुड़े जागरूकता कार्यक्रमों में जलवायु परिवर्तन कि भूमिका पर चर्चा भी हो।

अब यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी बच्चियों के बेहतर कल के लिए आज जलवायु परिवर्तन की गति पर लगाम लगाएँ। क्योंकि त्वरित जलवायु कार्यवाही अब नहीं तो कब?

(लेखिका बरेली एक प्राथमिक विद्यालय में अध्यापिका हैं और निजी स्तर पर किशोरियों और महिलाओं के लिए माहवारी से जुड़ी जागरूकता के लिए एक सेनीटरी पैड बैंक चलाती हैं।)

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