भारत में निजीकरण की प्रक्रिया को लेकर विभिन्न प्रकार की बहसें होती रही हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में यह प्रक्रिया तेजी से बढ़ी है। 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, निजीकरण और आर्थिक उदारीकरण के प्रति सरकार की नीतियाँ और दृष्टिकोण और भी स्पष्ट हो गए हैं। मोदी सरकार ने कई सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और संस्थाओं के निजीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हालांकि, जहां एक ओर यह प्रक्रिया देश के आर्थिक विकास को गति देने के रूप में देखी जाती है, वहीं दूसरी ओर इसका दलित समुदाय पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। यह लेख मोदी सरकार के तहत निजीकरण की नीतियों और उनके दलितों पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करेगा।
मोदी सरकार में निजीकरण की नीतियाँ और योजनाएँ
नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में कई बड़े कदम उठाए हैं जो निजीकरण की दिशा में अग्रसर हुए हैं। इन नीतियों का उद्देश्य सरकारी उपक्रमों और संस्थाओं को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना, भारतीय अर्थव्यवस्था को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मजबूत करना, और निवेश आकर्षित करना है। मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों के तहत कई सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण किया। सरकार का यह मानना था कि निजी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा से उत्पादन की गुणवत्ता में वृद्धि होगी और इस प्रकार आर्थिक विकास होगा।
भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों को लेकर मोदी सरकार ने ‘न्यू पब्लिक सेक्टर पॉलिसी’ की शुरुआत की, जिसके तहत सरकारी कंपनियों का रणनीतिक बिक्री और निजीकरण करने का प्रस्ताव था। इस नीति के अनुसार, सरकार ने रेलवे, विमानन, बैंकिंग क्षेत्र, विकास योजनाओं और ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ाने के लिए कदम उठाए। उदाहरण के तौर पर, रेलवे क्षेत्र में निजीकरण के द्वारा कुछ प्रमुख ट्रेन सेवाओं को निजी कंपनियों के हाथों में सौंप दिया गया। इसी तरह, सरकारी बैंकों के निजीकरण का भी प्रस्ताव आया, जिससे बैंकों का निजीकरण बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया। इन सभी योजनाओं का उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना था, लेकिन इसका दलित समुदाय पर प्रभाव बहुत गंभीर है।
दलित समुदाय और निजीकरण
भारत में दलित समुदाय, जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से लंबे समय से हाशिए पर रहा है सार्वजनिक क्षेत्र में स्थिर रोजगार, आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर निर्भर करता है। भारतीय संविधान ने दलितों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए आरक्षण जैसी नीतियाँ बनाई हैं, ताकि वे समाज में समान अवसर प्राप्त कर सकें। सरकारी क्षेत्र में दलितों को रोजगार देने के साथ-साथ सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाता था।
जब मोदी सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों को निजीकरण करने का कदम उठाया, तो इसका दलित समुदाय के लिए नकारात्मक प्रभाव पड़ा। निजीकरण के बाद, सरकारी क्षेत्र की नौकरी और आरक्षण की व्यवस्था खत्म हो जाती है।
क्योंकि निजी कंपनियाँ अपने कर्मचारी चयन में आरक्षण की नीति को लागू नहीं करतीं। इससे दलित समुदाय को सरकारी सेवाओं में मिलने वाले आरक्षण का लाभ खत्म हो जाता है। उन्हें निजी कंपनियों में कम वेतन वाली अस्थिर नौकरियों का सामना करना पड़ता है।
रोजगार के अवसरों पर असर
निजीकरण के कारण सरकारी उपक्रमों में दलितों को मिलने वाले स्थिर और सुरक्षित रोजगार के अवसर समाप्त हो जाते हैं। मोदी सरकार के निजीकरण प्रयासों के परिणामस्वरूप, सरकारी उपक्रमों में काम करने वाले दलित कर्मचारियों को या तो नौकरी से हाथ धोना पड़ा, या फिर उन्हें ठेका आधारित अस्थिर रोजगार दिया गया। निजी क्षेत्र में जहां मुनाफे को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं दलितों को सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, और अन्य भत्तों की सुविधा नहीं मिल पाती।
जैसे-जैसे सार्वजनिक कंपनियाँ निजी हाथों में जाती हैं, उनका मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है। इसके चलते दलितों के लिए रोजगार के अवसर और भी सीमित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, जब रेलवे, बैंकों और अन्य सरकारी उपक्रमों का निजीकरण हुआ, तो दलित समुदाय को उनकी नौकरी से हाथ धोने का डर था। इसके अलावा, जो कर्मचारी निजी क्षेत्र में काम करते हैं, उन्हें अक्सर ठेका आधारित और अस्थिर रोजगार की स्थिति में रखा जाता है, जो सामाजिक सुरक्षा के बिना होता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रभाव
निजीकरण का एक और बड़ा प्रभाव शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों पर पड़ा है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में भी निजीकरण की नीति को बढ़ावा दिया गया है। आयुष्मान भारत योजना को शुरू करने के बावजूद, स्वास्थ्य क्षेत्र में निजीकरण ने आम जनता, खासकर दलितों के लिए चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच को और भी कठिन बना दिया है। निजी अस्पतालों और क्लिनिकों में इलाज महंगा है, और दलित समुदाय के लिए यह सुविधाएँ पहुंच से बाहर होती हैं।
इसी तरह, शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकारी स्कूलों के बजाय निजी स्कूलों को बढ़ावा दिया गया है। सरकारी स्कूलों में आरक्षण का लाभ प्राप्त करने वाले दलित बच्चों के लिए निजी स्कूलों में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करना कठिन हो जाता है, क्योंकि ये स्कूल महंगे होते हैं और आरक्षण की नीति लागू नहीं होती।
आरक्षण नीति और निजीकरण
निजीकरण के तहत आरक्षण की नीति को लागू करना कठिन हो जाता है। सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले दलितों के लिए आरक्षण का प्रावधान था, जो निजी क्षेत्र में समाप्त हो जाता है। इस तरह से, मोदी सरकार के निजीकरण प्रयासों से दलितों के लिए आरक्षण का लाभ समाप्त हो सकता है, जिससे वे और भी हाशिए पर चले जाते हैं।
विशेषकर सरकारी बैंकों के निजीकरण और रेलवे के निजीकरण के प्रयासों ने दलितों के लिए रोजगार के अवसरों में कमी की है। पहले सरकारी क्षेत्र में आरक्षण लागू होने के कारण दलितों को बेहतर नौकरी और अवसर मिलते थे, लेकिन निजीकरण के बाद यह संभव नहीं रह जाता।
सामाजिक असमानता में वृद्धि
निजीकरण से सामाजिक असमानता और बढ़ सकती है, खासकर दलित समुदाय के संदर्भ में। जब सरकारी क्षेत्र का निजीकरण किया जाता है, तो वह उन लोगों के लिए और भी कठिन हो जाता है जो पहले से आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से कमजोर हैं। दलित समुदाय पहले से ही कई प्रकार की असमानताओं और भेदभाव का सामना करता है, और जब निजी कंपनियां अपने लाभ के लिए काम करती हैं, तो वे दलितों को और अधिक हाशिए पर डाल सकती हैं।
निष्कर्ष
निजीकरण को लेकर मोदी सरकार की नीतियाँ भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने का दावा करती हैं, लेकिन इसके सामाजिक प्रभावों पर गंभीर विचार करने की आवश्यकता है। दलितों के लिए यह एक नई चुनौती बन सकती है, क्योंकि यह उनकी सामाजिक सुरक्षा, रोजगार और समानता के अधिकारों को प्रभावित करता है।
सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निजीकरण की प्रक्रिया के दौरान दलितों के अधिकारों का उल्लंघन न हो और उनके लिए समान अवसर सुनिश्चित किए जाएं। इसके अलावा, मोदी सरकार को आरक्षण नीति को निजी क्षेत्र में भी लागू करने पर विचार करना चाहिए ताकि दलितों को सरकारी नौकरियों की तरह निजी कंपनियों में भी समान अवसर मिल सकें। इस दिशा में गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है ताकि भारत में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित किए जा सकें, और कोई भी समुदाय अपने अधिकारों से वंचित न हो।
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