कोई कितना भी गरीब क्यों ना हो वो रोटी, कपड़े और मकान का जुगाड़ कर ही लेगा लेकिन बात जब न्याय की आएगी न तो वो हार जाएगा। हार जाएगा इस सिस्टम से, कायदे और कानूनों की बात करने वाले अधिकारियों से और रोब झाड़ने वाले सिपाहियों से। और उस पर भी अगर आप गरीब के साथ साथ दलित हो तो तो आपके लिए न्याय की उम्मीद करना ही फिजूल है। ये बात हम ऐसे ही नहीं कर रही हूँ। बल्कि ऐसी ही एक घटना महाराष्ट्र से सामने आई है।
जहाँ जेब में सिर्फ 70 रूपए, हाथों में तख्तियां और मन में न्याय की उम्मीद लिए पुणे से पूरे 150 किलोमीटर दूर पैदल चलकर एक दलित परिवार मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलने मुंबई पहुंचा। लेकिन दुख की बात ये है कि 10 दिन से ज्यादा हो गए हैं। मुख्यमंत्री साहब को इतना समय नहीं कि वो दो मिनट के लिए उस पीड़ित परिवार से मिल लें।
7 फरवरी को अपने संघर्ष की कहानी को पोस्टरों पर लिखकर 35 साल के रतन नावगिरे पुणे से मुंबई के लिए निकले। उनके साथ उनके दो बच्चे और दो बहने भी हैं जो 150 किलोमीटर पैदल चलकर मुंबई आए हैं। 13 फरवरी को पूरा परिवार मुंबई के आजाद मैदान पहुंचा, जहां उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलने की कोशिश की लेकिन मुलाकात नहीं हुई।
दो सालों से जातीय दंश झेल रहा यह परिवार पुणे के पिंपरी-चिंचवड़ के थेरगांव का रहने वाला है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दो साल पहले रतन के बेटे का उच्च जाति के कुछ लोगों के साथ झगड़ा हो गया था। कारण ये था कि उच्च जाति के लोगों ने दलित बच्चे करण को यह कहकर अपमानित किया था कि तुम मांगने वाले लोग सुबह-सुबह अपना चेहरा क्यों दिखाते हो जिसका दलित बच्चे ने जवाब दे दिया था। फिर क्या था तथाकथित उच्च जाति वालों की तरफ से दलित परिवार को जातिगत गालियां, शारीरिक हमले और धमकियां देने का सिलसिला शुरू हो गया।
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पीड़ित दलित परिवार मातंग जाति से है जो महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति में आता है। पीड़ित की बहन रेशमा बताती हैं कि उनसे बेवजह झगड़ा किया जाता हैं। परिवार ने पिंपरी-चिंचवड नगर निगम यानी PCMC और पुलिस से कई बार शिकायत की, लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई। इसके बजाय, उनका पानी का कनेक्शन छह महीने पहले बिना किसी सूचना के काट दिया गया। जब वह पानी लाने के लिए बापूजी बुआ मंदिर के पास के सार्वजनिक टैंक गए तो स्थानीय लोगों ने उनके पानी के बर्तन में मरे हुए चूहे फेंक दिए।
इतना ही नहीं पीड़ित ने उत्पीड़न को रिकॉर्ड करने के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए, लेकिन आरोपियों ने उसकी मेमोरी चिप निकाल दी। घर के सामने सीवेज चैम्बर के अतिक्रमण का विरोध तो वाकाड पुलिस ने हिरासत में ले लिया रातभर पुलिस स्टेशन में रखा। यही नहीं उच्च जाति के लोगों ने पुलिस को बुलाकर उन्हें प्रताड़ित करवाया। रतन की 10 साल की बेटी नूतन को बेरहमी से मारा गया। सबूत मिटाने के लिए उनका मोबाइल छीन लिया गया। पीड़ित के मुताबिक वह दूसरी पीढ़ी से इस ज़मीन पर रह रहे हैं लेकिन फिर भी उनसे जमीन के कागजात मांगे जा रहे हैं।
न्याय के लिए उन्होंने PCMC आयुक्त से मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्हें वापस पुलिस थाने भेज दिया गया। वहां उन्हें सुबह 11 बजे से आधी रात तक हिरासत में रखा गया और कथित रूप से फर्श साफ करने के लिए मजबूर किया गया। 6 फरवरी को, जब कोई और रास्ता नहीं बचा, तो उन्होंने PCMC आयुक्त को एक लिखित शिकायत दी। जब वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला, तो उन्होंने मुंबई के लिए पैदल मार्च करने का फैसला किया। जब वे मुंबई की ओर बढ़े, तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की।
वे सुबह से लेकर शाम तक चलते रहे, जहां जगह मिली, वहीं सो गए। कभी स्कूल परिसर, कभी सड़क किनारे तो कभी मंदिरों में। हालांकि, मंदिरों में भी उन्हें किसी ने घुसाने नहीं दिया। रतन की दूसरी बहन सोनम ने बताया, “कई मंदिरों में शरण मिली, लेकिन दो मंदिरों में उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया।यात्रा के दौरान भी उन्हें उत्पीड़न झेलना पड़ा। रेशमा ने कहा, “एक आदमी ने रात में हमें परेशान करने की कोशिश की, तो हमने पुलिस को बुलाया। इसके बाद पुलिस ने हमें पनवेल के शेडुंग टोल प्लाजा पर रात बिताने के लिए भेज दिया।” थकान और डर के बावजूद, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मंकरुड पहुंचने पर कुछ अधिकारियों ने उनकी हालत देखी और उन्हें आज़ाद मैदान तक पहुंचाने का इंतजाम किया। जहां वे फूलों की माला बेचकर गुजारा कर रहे हैं।
उन्हें मुंबई पहुंचे दस दिन से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन अब तक कोई अधिकारी उनसे मिलने नहीं आया। वे रेलवे स्टेशनों पर रात बिताते हैं और दिनभर आज़ाद मैदान में विरोध प्रदर्शन करते हैं।
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रतन ने कहा, “हम यहां इसलिए आए हैं क्योंकि हमारी जान को खतरा है। अगर सरकार ने हमारी सुनवाई नहीं की, तो हमारे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बची है। हमारी मांग बस इतनी है कि जिन्होंने हम पर हमला किया, उन्हें सज़ा मिले और जिन संस्थानों ने हमें असहाय छोड़ा, उनकी जवाबदेही तय की जाए। अगर हम झूठ बोल रहे होते, तो इतनी लंबी और जोखिम भरी यात्रा नहीं करते।”
वहीं मातंग समुदाय के जिला सचिव सनी दादर ने प्रशासन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि, “पुलिस ने दो साल में केस दर्ज कर सम्मानजनक व्यवहार किया होता, तो यह स्थिति नहीं आती। सरकार महिलाओं के लिए लाड़ली बहिन योजना जैसी योजनाओं की बात करती है, लेकिन दलित महिलाओं के लिए न्याय कहां है?”
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लेकिन दूसरी तरफ कलवाड़ी पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि रतन के बेटे ने गलती से पानी गिरा दिया था, जिसे उसने खुद साफ किया। लेकिन रतन और उनकी बहनें इस दावे को झूठा बताती हैं। PCMC अधिकारियों ने दावा किया कि उनके घर का पानी कनेक्शन और शौचालय अवैध था। हालांकि, रतन ने वैध दस्तावेज दिखाने की बात कही और पूछा, “अगर यह अवैध था, तो पहले कनेक्शन क्यों दिया गया?”
G वार्ड के सहायक आयुक्त किशोर नानावरे ने कहा कि पानी का कनेक्शन 25 साल पहले एक स्थानीय पार्षद ने दिया था और शौचालय साझा क्षेत्र में बनाया गया था। वहीं रतन और उनका परिवार अब कोर्ट में जाने की तैयारी कर रहा है। उनका कहना है कि अगर मुख्यमंत्री उनसे नहीं मिले, तो वे दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से गुहार लगाएंगे। वहीं उनकी बहन रेशमा ने कहा, “हमारे पास पैसे नहीं हैं, लेकिन हमारे पास सच है।”
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