Ambedkar Birth Anniversary: भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय इतिहास के उन महामानवों में से हैं, जिनके विचार और संघर्ष केवल किसी एक जाति या वर्ग के लिए नहीं थे, बल्कि पूरे समाज के पुनर्गठन और मानवमूल्य आधारित राष्ट्र के निर्माण के लिए थे। हर वर्ष 14 अप्रैल को देशभर में अंबेडकर जयंती मनाई जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अक्सर अंबेडकर को श्रद्धांजलि देते हैं, पंचतीर्थ स्थलों की चर्चा करते हैं और उन्हें संविधान निर्माता के रूप में सम्मानित करते हैं।
लेकिन क्या अंबेडकर का सम्मान केवल प्रतिमाओं, भाषणों और माल्यार्पण तक सीमित रहना चाहिए? क्या अंबेडकर की विचारधारा को व्यवहार में उतारने का कोई प्रयास हो रहा है? यदि नहीं, तो आगामी अंबेडकर जयंती को बीजेपी और मोदी सरकार के लिए आत्ममंथन का अवसर मानना चाहिए।
1. अंबेडकर की विचारधारा को संकुचित न करें
बीजेपी और मोदी सरकार जब भी अंबेडकर की बात करते हैं, तो उन्हें लगभग पूरी तरह से “दलितों के मसीहा” के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि अंबेडकर ने दलितों के लिए अभूतपूर्व संघर्ष किया, लेकिन उनका जीवन दर्शन केवल दलित समाज की मुक्ति तक सीमित नहीं था। वे सभी उत्पीड़ितों—स्त्रियों, श्रमिकों, धार्मिक अल्पसंख्यकों और शोषित वर्गों—के लिए न्याय के पक्षधर थे।
अंबेडकर ने धर्म, अर्थव्यवस्था, राजनीति, और शिक्षा जैसे सभी क्षेत्रों में समानता और तर्क की स्थापना की बात की थी। मोदी सरकार को चाहिए कि वह उनके विचारों को पूरे भारतीय समाज के पुनर्गठन के संदर्भ में पढ़े और अपनाए।
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2. शिक्षा और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना
अंबेडकर ने कहा था—”शिक्षा शस्त्र है जो व्यक्ति को स्वतंत्र बनाता है।” लेकिन आज उच्च शिक्षा में निजीकरण बढ़ रहा है, छात्रवृत्तियों में कटौती हो रही है और अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य वंचित तबकों के लिए अवसरों की संख्या घटती जा रही है। मोदी सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बनाए, और शैक्षणिक संस्थानों में अंबेडकर के विचारों की मौजूदगी को मजबूत करे।
इसके साथ ही, अंबेडकर जिस वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समर्थक थे, उस पर ज़ोर दिया जाए। मोदी सरकार को धार्मिक अंधविश्वासों और पौराणिक मिथकों के विज्ञान के नाम पर महिमामंडन की प्रवृत्तियों से बचना होगा।
3. आरक्षण और सामाजिक न्याय को सशक्त करना
अंबेडकर ने आरक्षण की व्यवस्था को सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए एक अस्थायी लेकिन आवश्यक उपाय माना था। आज जबकि सरकारी नौकरियों का निजीकरण हो रहा है, संविदा आधारित नियुक्तियाँ बढ़ रही हैं, आरक्षण का वास्तविक लाभ कम होता जा रहा है।
मोदी सरकार को चाहिए कि वह न केवल सरकारी क्षेत्रों में आरक्षण को प्रभावी बनाए रखे, बल्कि निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू करने की दिशा में गंभीर कदम उठाए। साथ ही, विश्वविद्यालयों और न्यायपालिका में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
4. असहमति और लोकतंत्र का सम्मान करें
अंबेडकर ने भारतीय लोकतंत्र की नींव इस विचार पर रखी थी कि हर नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार हो। लेकिन आज देश में असहमति को राष्ट्रविरोधी ठहराया जा रहा है। पत्रकारों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है।
बीजेपी सरकार अगर अंबेडकर को सही मायनों में श्रद्धांजलि देना चाहती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित न हो, बल्कि सामाजिक और वैचारिक स्वतंत्रता का भी सम्मान करे।
5. सांस्कृतिक प्रतीकों का राजनीतिक शस्त्रीकरण न हो
डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा पर फूल चढ़ाना, उनके स्मारकों का उद्घाटन करना या उनके नाम पर संस्थानों का नामकरण करना एक सकारात्मक पहल हो सकती है, लेकिन जब इन प्रतीकों का इस्तेमाल सामाजिक विषमता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को ढकने के लिए किया जाता है, तो यह अंबेडकर के साथ अन्याय है।
मोदी सरकार को चाहिए कि वह अंबेडकर को राजनीतिक पूंजी की वस्तु न बनाए, बल्कि उनके उस मूल संघर्ष को याद रखे, जो उन्होंने वर्णव्यवस्था, ब्राह्मणवाद और गैर-बराबरी के विरुद्ध किया था।
6. महिलाओं और श्रमिकों के अधिकार पर ध्यान दें
अंबेडकर महिलाओं की स्वतंत्रता के पक्षधर थे। उन्होंने हिंदू कोड बिल के जरिए महिलाओं को समान अधिकार दिलाने की कोशिश की थी। आज मोदी सरकार को भी अंबेडकर के नारीवाद दृष्टिकोण से सीख लेकर महिलाओं की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
साथ ही, अंबेडकर मजदूर वर्ग के अधिकारों के प्रबल समर्थक थे। सरकार को श्रम कानूनों में किए गए संशोधनों पर पुनर्विचार करना चाहिए और श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और यूनियन की आज़ादी की रक्षा करनी चाहिए।
7. बौद्ध धर्म और नैतिकता आधारित जीवन मूल्यों को अपनाना
अंबेडकर ने जीवन के अंतिम वर्षों में बौद्ध धर्म को अपनाया, जो तर्क, करुणा और समता पर आधारित है। उन्होंने कहा था कि बौद्ध धर्म उन्हें वह नैतिक धरातल देता है जो जातिवादी हिंदू धर्म नहीं दे सका।
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मोदी सरकार यदि वास्तव में अंबेडकर का सम्मान करना चाहती है, तो उसे बौद्ध तीर्थों, शिक्षण संस्थानों और नवबौद्ध समुदाय के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। साथ ही, उसे अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित नैतिक, धर्मनिरपेक्ष और तर्कशील समाज के विचार को व्यवहार में लाना चाहिए।
8. अंबेडकर की विरासत को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाएं
आज भी अंबेडकर के विचार विश्वविद्यालयों, मीडिया, और राजनीति में हाशिए पर रखे जाते हैं। मोदी सरकार को चाहिए कि वह अंबेडकर की रचनाओं—जैसे जाति का विनाश, बुद्ध और उनका धम्म, हिंदू धर्म में अस्पृश्यता की उत्पत्ति—को शैक्षणिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए, और अंबेडकर पर आधारित रिसर्च, सेमिनार और संवाद को प्रोत्साहित करे।
निष्कर्ष
डॉ. अंबेडकर केवल संविधान निर्माता या दलितों के नेता नहीं थे—वे एक वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के पक्षधर विचारक थे। उनका सपना एक ऐसा भारत था, जहां जाति, लिंग, धर्म और वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव न हो।
बीजेपी और मोदी सरकार को अंबेडकर जयंती पर महज़ प्रतीकों तक न रुकते हुए, उनके विचारों को सरकारी नीतियों, सामाजिक व्यवहार और जनसंवाद में जगह देनी चाहिए। यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अंबेडकर को केवल स्मरण न करें—अंबेडकर को जीवित करें।
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