भारत में दलित समुदाय की स्वास्थ्य समस्याएँ एक गंभीर और जटिल सामाजिक मुद्दा हैं। जहां एक ओर भारत ने पिछले कुछ दशकों में आर्थिक प्रगति की है, वहीं दूसरी ओर दलितों को स्वास्थ्य सेवाओं में समानता की कमी और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। यह असमानता न केवल उनके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालती है। इस लेख में हम दलित समुदाय की स्वास्थ्य समस्याओं का गहन विश्लेषण करेंगे, इसमें जातिवाद के प्रभाव को समझेंगे और अंत में समाधान की दिशा में कुछ प्रमुख सुझाव प्रस्तुत करेंगे।
दलित समुदाय और स्वास्थ्य असमानताएँ
स्वास्थ्य असमानताएँ भारत में एक स्थापित और स्थायी समस्या हैं। लेकिन दलित समुदाय के लिए यह समस्या और भी अधिक जटिल है। दलितों को जहाँ एक तरफ खराब स्वास्थ्य सेवाओं का सामना करना पड़ता है। वहीँ दूसरी तरफ उनको सामाजिक, आर्थिक, और जातिवादी भेदभाव का भी शिकार होना पड़ता हैं।
जोकि उनके स्वास्थ्य पर सीधा असर डालते हैं।
1. स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता का मुख्य कारण जातिवाद, गरीबी और शिक्षा की कमी है। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में दलित समुदाय को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसके साथ साथ निजी अस्पतालों में उच्च लागत के कारण उनका पहुँचना लगभग असंभव हो जाता है। 2017 में एक रिपोर्ट ने यह पाया कि केवल 27% दलितों को ही सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ मिलता है। जबकि 62% उच्च जातियों को स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच है। यह असमानता स्वास्थ्य के मामले में दलितों को और भी पीछे धकेल देती है।
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2. स्वास्थ्य जागरूकता की कमी
स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण है। जो दलित समुदाय को अधिक जोखिम में डालता है। दलितों के बीच खासकर दलित महिलाओं में शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत कम होने के कारण वे अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को पहचानने और उनका समाधान करने में असमर्थ रहती हैं। WHO की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता में 60% की कमी पाई गई। विशेषकर उन इलाकों में जहँ दलितों और आदिवासी समुदायों का रहना होता है। यह स्थिति केवल चिकित्सकीय देखभाल की कमी के ही कारण नहीं है। बल्कि एक व्यापक सामाजिक और आर्थिक असमानता के मिले जुले गठजोड़ का परिणाम है।
3. जातिवाद और स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव
भारत में जातिवाद केवल समाज के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं में ही विद्द्मान नहीं है। बल्कि इसकी बीमारी स्वास्थ्य क्षेत्र में भी गहरे पैठ बनाये हुए है। दलितों को अक्सर अस्पतालों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यह भेदभाव सिर्फ चिकित्सकों साथ अस्पताल के कर्मचारी भी दलितों के साथ असमान व्यवहार करते हैं। 2018 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 45% दलितों ने यह रिपोर्ट किया कि उन्हें अस्पतालों में जातिवाद का सामना करना पड़ा है। जबकि उच्च जातियों के मरीजों को प्राथमिकता दी जाती थी।
स्वास्थ्य पर जातिवाद का प्रभाव
भारत में जातिवाद का प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं पर गहरे और स्थायी रूप से पड़ा है। जातिवाद का असर केवल भौतिक स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। दलितों के लिए स्वास्थ्य सेवा एक भेदभावपूर्ण अनुभव बन जाती है। जहां वे अपमानित होते हैं, और उन्हें न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक आघात भी सहना पड़ता है। इस संदर्भ में डॉ. बी. आर. अंबेडकर के विचारों को समझना महत्वपूर्ण है। उन्होंने हमेशा यह कहा कि जातिवाद सिर्फ एक सामाजिक विकृति नहीं है, बल्कि यह समाज के हर पहलू को प्रभावित करता है, जिसमें स्वास्थ्य भी शामिल है।
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स्वास्थ्य सेवाओं में जातिवाद का सामना करने के बाद, दलित समुदायों के लोगों में अस्पतालों और डॉक्टरों के प्रति अविश्वास बढ़ता है। यह अविश्वास केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह समुदाय के भीतर एक मानसिकता बना देता है कि स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उच्च जाति के लोगों के लिए ही है। इसके परिणामस्वरूप दलित लोग समय पर चिकित्सा सहायता नहीं लेते और उनके स्वास्थ्य की स्थिति और बिगड़ जाती है।
दूसरे सामाजिक-आर्थिक कारण
इसके अतिरिक्त, दलितों को गरीबी और असमान आर्थिक स्थितियों का भी सामना करना पड़ता है। जिसके कारण उनकी स्वास्थ्य समस्याएँ और भी गहरी हो जाती हैं। गरीबी के कारण दलितों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हो पातीं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में दलितों के पास स्वास्थ्य खर्च के लिए औसतन 50% कम संसाधन होते हैं। जबकि तथाकथित उच्च जातियों के पास अधिक संसाधन होते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि गरीबी और स्वास्थ्य असमानताएँ एक-दूसरे को बढ़ावा देती हैं।
समाधान की दिशा
स्वास्थ्य शिक्षा और जागरूकता
दलित समुदाय के बीच स्वास्थ्य शिक्षा को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्हें बुनियादी स्वच्छता, टीकाकरण, प्राथमिक चिकित्सा और पोषण के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। विशेष रूप से, महिलाओं और बच्चों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। क्योंकि वे स्वास्थ्य असमानताओं का सबसे बड़ा शिकार होते हैं। 2018 की एक रिपोर्ट ने यह सुझाव दिया था कि अगर ग्रामीण दलितों को स्वास्थ्य शिक्षा और स्वच्छता के बारे में बेहतर जानकारी दी जाए। तो उनकी जीवन प्रत्याशा में 5-7 साल तक का सुधार किया जा सकता है।
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार
सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में सुधार की आवश्यकता है। अस्पतालों को दलित समुदाय के लिए और अधिक सुलभ और भेदभाव-मुक्त बनाना चाहिए। इसके लिए जातिवाद के खिलाफ सख्त उपाय किए जाने चाहिए। जैसे कि अस्पतालों में दलितों के लिए विशेष कक्षों की व्यवस्था, और चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य कर्मचारियों को जातिवाद पर प्रशिक्षण देना।
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दलित डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मचारियों का योगदान
दलित समुदाय के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए, चिकित्सा क्षेत्र में दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना आवश्यक है। मेडिकल कॉलेजों में दलित छात्रों के लिए विशेष प्रवेश योजनाएँ और छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जानी चाहिए।
सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार
सरकार को दलितों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को मजबूत करना होगा, ताकि वे स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकतम लाभ उठा सकें। इसके लिए, मुफ्त स्वास्थ्य बीमा, स्वास्थ्य देखभाल योजनाएँ और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच सुनिश्चित करनी चाहिए।
निष्कर्ष
भारत में दलित समुदाय की स्वास्थ्य समस्याएँ केवल चिकित्सा के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और आर्थिक असमानता का परिणाम हैं। जातिवाद, गरीबी, और शिक्षा की कमी ने दलितों के स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाला है। स्वास्थ्य सेवाओं में असमान पहुँच, जागरूकता की कमी और भेदभाव के कारण उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता जा रहा है। यदि हमें इन समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना है, तो हमें केवल चिकित्सा सुविधाओं में सुधार नहीं करना होगा, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानसिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए एक ठोस नीति अपनानी होगी। केवल इस तरह से हम दलित समुदाय के स्वास्थ्य में सुधार ला सकते हैं और उन्हें मुख्यधारा में शामिल कर सकते हैं।
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