जातिवाद और पर्यावरण: दलितों के अधिकारों की रक्षा और प्राकृतिक संसाधनों तक उनकी पहुंच

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भारत में जातिवाद एक पुरानी और गहरी समस्या है। जो न केवल सामाजिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित करती है, बल्कि पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों तक समान पहुंच में भी एक बड़ी बाधा बनती है। यह एक ऐसी कड़ी है, जो समाज के सबसे कमजोर और हाशिए पर रहने वाले वर्ग, यानी दलितों, को गंभीर पर्यावरणीय संकटों और असमानताओं का सामना करने के लिए मजबूर करती है। विशेष रूप से दलित समुदायों का सबसे बड़ा संकट उनकी बुनियादी अधिकारों, जैसे पानी, स्वच्छता, और सुरक्षित पर्यावरण तक पहुंच में भेदभाव का होना है। इसके अलावा, मैन्युअल स्केवेंजिंग जैसे अपमानजनक और खतरनाक कार्यों में भी दलित समुदाय के लोग शामिल होते हैं। जो न केवल सामाजिक असमानता का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी इस समुदाय के पर्यावरणीय संकटों और स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ाते हैं।

1. जातिवाद और प्राकृतिक संसाधनों तक असमान पहुंच

भारत के ग्रामीण इलाकों में दलित समुदायों को जल, वन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच में अक्सर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यह समस्या खासकर उन गांवों में और पिछड़े क्षेत्रों में ज्यादा गंभीर है, जहां उच्च जातियां प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार बनाये हुए हैं। उदाहरण के लिए, कई ग्रामीण क्षेत्रों में दलितों को सार्वजनिक जल स्रोतों जैसे कुएं, तालाब और नदियों से पानी लेने से रोका जाता रहा है। कई बार उन्हें गंदे और दूषित जल स्रोतों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जो बहुत सारी गंभीर बिमारियों का कारण बनते हैं।

इसी तरह, भारत में वन संसाधनों पर भी दलितों को समान अधिकार नहीं मिलता। वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) के बावजूद, दलित समुदाय को अक्सर जंगल से लकड़ी, घास, या अन्य संसाधन लेने से वंचित किया जाता है। इस कारण उन्हें अपने रोज़गार के लिए पर्यावरणीय संसाधनों का न्यूनतम उपयोग करने में कठिनाई होती है। जो उनके जीवनयापन और सामाजिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालता है।

2. मैन्युअल स्केवेंजिंग: एक पर्यावरणीय और सामाजिक संकट

भारत में मैन्युअल स्केवेंजिंग, यानी हाथ से गंदगी साफ करने की प्रथा, एक कुख्यात सामाजिक बुराई है। जो दलितों के जीवन को अत्यंत कठिन बना देती है। इस प्रथा का अधिकांश हिस्सा दलित समुदायों से संबंधित है। जो इस घृणित कार्य को करने के लिए मजबूर होते हैं। मैन्युअल स्केवेंजिंग के दौरान, दलितों को सीवेज, गटर, और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई के काम करना पड़ता है। जो न केवल शारीरिक रूप से खतरनाक होता है, बल्कि यह स्वास्थ्य संकटों, जैसे कि गंभीर संक्रमण, श्वसन रोग, और मानसिक तनाव का कारण बनता है।

यह काम न केवल दलितों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि यह पर्यावरणीय समस्या को भी बढ़ाता है। जब गंदगी को ठीक से नष्ट नहीं किया जाता, तो यह न केवल प्रदूषण का कारण बनता है, बल्कि जल स्रोतों को भी दूषित करता है. जो स्वास्थ्य के लिए और अधिक खतरनाक होता है। इस प्रकार, मैन्युअल स्केवेंजिंग से जुड़ी समस्याएं दलित समुदाय की सामाजिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्थितियों को और जटिल बना देती हैं।

3. मेट्रोपोलिटन शहरों में दलितों का जीवन: कचरे के ढेर के पास अस्तित्व

वर्तमान समय में भारतीय महानगरों जैसे दिल्ली, मुंबई, और कोलकाता में दलितों की बड़ी संख्या कचरे के ढेर और डंपिंग यार्ड के आसपास बसने के लिए मजबूर है। इन शहरों में, जहां आर्थिक विकास और शहरीकरण तेजी से हो रहा है, वहीं दलितों को बुनियादी सुविधाओं और साफ-सुथरे रहने के स्थान से वंचित रखा गया है। दिल्ली जैसे महानगरों में, दलित समुदाय के लोग अक्सर उन डंपिंग यार्डों के पास रहते हैं, जहां से उन्हें कचरे के ढेर से कुछ उपयोगी चीजें निकालने की उम्मीद होती है।

इन क्षेत्रों में रहने वाले दलितों को भयंकर प्रदूषण का सामना करना पड़ता है। इसके साथ साथ इन स्थानों पर स्वास्थ्य समस्याएं भी आम हो जाती हैं। कचरे के ढेरों से निकलने वाली गंदगी, सीवेज, और रसायन से पानी और हवा प्रदूषित हो जाते हैं। दलित बस्तियों के निवासियों के लिए जीवन को और भी कठिन बना देते हैं। इसके परिणामस्वरूप, इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग अत्यधिक शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करते हैं, जैसे श्वसन रोग, त्वचा रोग, और संक्रमण।

साथ ही, यहां के लोग अपमानजनक कार्यों में लगे होते हैं। जैसे कचरे से प्लास्टिक, धातु और अन्य पुनर्नवीनीकरण योग्य सामग्री निकालना, जो उन्हें न्यूनतम आय प्रदान करने का एकमात्र साधन होते हैं। इन डंपिंग यार्डों स्थलों के पास रहने वाले दलितों को न केवल अपार पर्यावरणीय समस्याओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि उन्हें समाज से भी मानसिक और सामाजिक बहिष्करण का सामना करना पड़ता है।

4. पर्यावरणीय असमानता और स्वास्थ्य पर असर

इन डंपिंग स्थलों के पास रहने वाले दलित समुदायों के जीवन में पर्यावरणीय असमानताएँ बहुत गहरी होती हैं। यह असमानता उनके स्वास्थ्य, जीवन गुणवत्ता और सामाजिक स्थिति को प्रभावित करती है। प्रदूषण, गंदगी, और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण इन समुदायों में जीवनकाल घट सकता है और विभिन्न रोगों के प्रकोप से उनकी हालत और भी गंभीर हो सकती है।

इस तरह की स्थितियाँ उनके लिए शारीरिक और मानसिक संकट भी उत्पन्न करती हैं। कचरे के ढेरों के पास रहने के कारण इन लोगों को भयंकर मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। क्योंकि यह उनके जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है।

5. समाधान और भविष्य की दिशा

दलितों को प्राकृतिक संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। जल, वन, और भूमि संसाधनों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करना और उनकी संरक्षण नीतियों में भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है।

स्केवेंजिंग के उन्मूलन के लिए सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे। इसके साथ साथ, दलितों को इस घृणित काम से मुक्त करने के लिए रोजगार के वैकल्पिक साधन उपलब्ध अति आवश्यक है। इसके अलावा, स्वच्छता और सार्वजनिक सफाई में दलितों को सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण प्रदान किया जाना भी अनिवार्य है।

महानगरों में दलितों को कचरे के ढेर के पास रहने से मुक्त करने के लिए सरकार को उनके लिए सुरक्षित और स्वच्छ आवास उपलब्ध कराने चाहिए। इसके लिए विशेष योजनाओं का निर्माण आवश्यक है, जिससे दलितों के जीवन स्तर में सुधार हो सके।

इसके साथ साथ दलितों को पर्यावरणीय संकटों और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना भी जरूरी है। ताकि वे न केवल अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकें, बल्कि अपने पर्यावरण की रक्षा करने में भी योगदान दे सकें।

निष्कर्ष

जातिवाद और पर्यावरणीय असमानताएँ भारतीय समाज के दो जटिल मुद्दे हैं जो आपस में जुड़े हुए हैं। दलित समुदायों के लिए प्राकृतिक संसाधनों तक समान पहुंच, स्वच्छता और स्वास्थ्य की बेहतर स्थिति, और एक सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना केवल पर्यावरणीय बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय का भी सवाल है। जब तक इन समस्याओं को हल नहीं किया जाता, तब तक हम एक समान, न्यायपूर्ण और समावेशी समाज का निर्माण नहीं कर सकते।

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